परछाइं
अपनी संगीन परछाइं से
तुझे दूर कर चला हूँ।
दिन में तेरे दिख जाने के सच को
घूँट - घूँट पी चला हूँ।
रातों को
तेरे अस्तित्व के होने के शक से
अब वंचित हो चला हूँ।
डरो नहीं ए मन!
बीते दिनों के डर को
परछाइयों की ही भांति
पैरों तले कुचल
मैं मीलों दूर बढ़ चला हूँ।
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