एक दफ़ा खुद को आईने में देखा

-महिमा राबिया

आज फिर
एक दफ़ा खुद को आईने में देखा।
हाँ एक अर्से बाद देखा,
पर खुद को, खुद के पार देखा।

न जाने किस के साथ देखा!
पीछे छूट चुका कल,
या आने वाला हाल देखा!

बस इतना देखा
कि इन आँखों को
जिस झलक की दरकार थी,
उसे बनते तेरी बातों का
सार देखा।

आज फिर
खुद को आईने में एक बार देखा।
हाँ एक अर्से बाद देखा,
पर खुद को, खुद के पार देखा ।

हिदायतों की नज़ाकत को संभाले,
तेरी शख्सियत को रख कर
फलक मर्तबा देखा।

हासिल तेरा हाल
हुआ हो ना हो,
एक सच्चाई को
आईने में उभरते देखा।

वो जो आईना
मेरी जिंदगी का
प्रतिबिंब सा लगता रहा था,
आज उसे
तेरे ही हकीकत के तीरों से
चूर होते देखा।

वो...
जिसमें अपनी गलती गिन,
उन गलतियों से खुद का उदार होते देखा,
आज वो आईना,
तेरी आँखों का समंदर सा होता देखा।
उन आँखों में
तेरी शिकायतों का संसार होते देखा।

आज फिर
एक दफ़ा खुद को आईने में देखा।
हाँ एक अर्से बाद देखा,
पर खुद को, खुद के पार देखा ।


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