School के बाद भी...
-महिमा राबिया
ये जो तीन कांटों
और कुछ अंकों वाली चीज़
हाथ पर बँधी रहती थी,
आज उसे घर ही छोड़ आया हूँ।
बस के टाईम का अंदाज़ा तो
सामने चाय वाले की दुकान के खुलने
से भी लग ही गया है।
दिन ढलते,
सूरज सिर के ऊपर जो चढ़ते जा रहा है
बीतते वक़्त का एहसास दिला रहा है।
क्यूँ नहीं आज मैं
बस स्टॉप का रास्ता भूल गया!
बेवक्त वक़्त देख - देख कर,
क्यूँ वक़्त इतना बीत गया!
अब ज़िन्दगी का वज़न ज़्यादा
और बैग का कम हो चला है।
यहाँ से आगे रास्ते सब नज़र आ रहे हैं,
आज़माना है कौन सा भला है।
पहले दिन से लेकर
आज तक की सारी छवियां
ज़हन में उतर रही हैं।
समझ नहीं आ रहा,
छोटी - छोटी चीजें भी
कैसे घर कर रही हैं!
आज सब बटोर लेने को जी कर रहा है।
दिन आखरी है ये,
शायद इसीलिए मौसम भी
संघर्ष कर रहा है।
जेब कुछ भारी सा लग रहा है।
जो ये दिल समा न सका
यादों की उन हवाओं को
चुपके से ये अपने अंदर भर रहा है।
कहीं कैद है
क्लास के उस कोने में अफसाना मेरा।
चलो आज कह ही दूँ
इस कैद में ही है
ज़माना मेरा।
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