सफ़र

-महिमा राबिया

ऐ मंज़िल के सौदागर !
कभी इन रास्तों पर भी नज़र फेर दे
कुछ ऐसा कर कि इन पर मोहब्बत बिखेर दे।
शिकायत नहीं इन मुश्किलों से ,
पर कुछ बेवजह की गुस्ताखियां कर
और हसीन कुछ तकलीफें कर दे।
वादा है तुझसे
इन काँटों पर चल जाऊँगी ,
इन ऊंचे - नीचे सवालों को हल कर जाऊँगी।
एक करम कर तू बस -
मुझे मुसाफिर तो बना दिया
अब साथ कोई हमसफ़र कर दे।
के उस क्षितिज तलक उसको दिखलाउंगी।
हैं चांद - तारे ,
ये नज़ारे कितने खूबसूरत
उसको बतलाऊंगी।
है दिल ये यही कहीं ,
सोचता है दिललगी से दूर ही है
महफूस, सही
तू कर थोड़ी मिन्नतें,
दिखा इसे नए रास्ते ,
जीना सिखा इसे किसी के वास्ते।
सच कहूँ तो
शायद ये डरता है।
लोगों को मोहब्बत के भेस में
नफरत करते जो देखता है।
आज तू उसे यकीन दिला,
के हो वो खिलाफ उस डर के खड़ा।
कह उसे की वो भी मुस्कुराए ,
कह उसे की वो भी दिल लगाए।
ना किसी इंसान से तो
किसी टूटे दिल से ही सही ,
पर एक बार फिर
वो किसी का
हमदर्द बन के दिखाए।

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