एक तरफा।
-महिमा राबिया
कहीं तो होगी मंज़िल
के जो रास्ते हैं इतने मुश्किल।
यूंही नहीं पूरे होते हैं डगर।
कहीं तो होगा खड़ा
कोई बेताब हमसफ़र।
ये मद्धम - मद्धम
हवाओं का चलना ,
ये आहिस्ता से
तेरी साँसों के रुख का बदलना ,
ये तेरी मोहब्बत का लुप्त होना ,
ये मेरी शख्सियत का ढलना।
सब कुछ खो कर भी मुस्कुरा रही हूँ।
जो पा ना सकी
उसे आंखों से ओझल होता देख
ना घबरा रही हूँ।
कैसे इस एक तरफा इश्क़ को
दो तरफा रिश्ता कह दूँ ?
जो अपना था ही नहीं
कैसे उसे किन्ही जंजीरों में
कैद कर दूँ ?
शायद अधूरा ही कहलाए ये रिश्ता ,
पर मुकम्मल कहलाना हक़ है इस दिल का।
तेरी खामोशी के शोर में
इस दिल की गुमनामी को लिख रही हूँ।
कहीं कोई मोहब्बत से खफा ना हो
ये आरज़ू लिए चल रही हूँ।
कोशिश है बस इतनी -
तेरी मंज़िल का पता लिखा हो
मेरी महफिल में ,
जिस कदर मेरे खतों का गंतव्य है
तेरे दिल में।
फर्क बस इतना है -
तेरे रास्ते कहीं जाकर रुकेंगे नहीं
और मेरे खत
किसी और का पता पूछेंगे नहीं।
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