लाज़मी है...
-महिमा राबिया
लाज़मी है,
रास्ते में कुछ रास्तों का छूटना
आधे सफ़र में मंज़िल को ढूंढना।
कुछ पंखुड़ियों का खिल के बिखरना
कुछ का बिखर के निखरना।
बस उन पंखुड़ियों की ही तरह है तमन्ना।
बेशक , ज़मीन पर गिरना।
पर हवाओं से रुख ना मोड़ना।
इस तब्दीलियत की कद्र करती हूँ।
हर मोड़ को ... रास्ते की छोर को
नए ढांचे में बुनती हूँ।
जो छूट गया सो छूट गया,
हर राह नहीं खुद को छोड़ा करती हूँ।
जो टूट गया सो टूट गया,
हर बार नहीं खुद को तोड़ा करती हूँ।
हर कदम पर एक डर का ताज सजा है।
हर ताज में
एक हार , एक जीत लिखा है।
है कठिन ये चुनाव,
कि किस रास्ते ये कदम बढा़ऊं !
शऽऽ...!!....
इस डर के शोर से शायद वो जाग जाएगा।
है मंज़िल दूर अभी ,
ये वो सोता दिल जान जाएगा।
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