अस्तित्व
~द्वारा - महिमा राबिया ❣️
मैं।
सरल सी चक्रव्यूह में ढलती,
पानी की बूंदों में पिघलती,
कुम्हार के हाथों में डोलती,
न जाने किस आकार में
इस संसार में
एक पग भर की राह बनाती।
मेरा अंश ही है
उस चाक की काया,
जिसने हर पहर
है एक नया रूप पाया।
कभी मूर्ति गणेश की
तो कभी वीणा सरस्वती की।
कभी कान्हा के हाथों की बनी बंसी,
तो कभी कायाकल्प महेश की।
बन कर
हर दफा टूटती हूँ।
टूट कर हर दफा
नए सूरत में उभरती हूँ।
खुद को अनेकों नाम देकर
अपने मूल अस्तित्व को पहचान देकर
नए रंग, नए लिबास ओढती हूँ।
हर बार कायापलट सा हो जाता है मेरा।
रूप बदलते, रंग बदलते
एक खासा रूह समाए चलती हूँ।
अपनी अंतरात्मा को जगाए रखती हूँ।
ये भूले बिना
कि मैं...
मिट्टी हूँ ।
हर रुप में ढलना
भले ही मेरी खासियत है।
मगर मैं...
मिट्टी हूँ ।
व्योम तले, इस धरती की
अपनी मिट्टी हूँ।
Deep expression in sweet lines
ReplyDelete👌Keep up
Thank u loads! ☺️
DeleteMashaalla....kya likha h aapne!!😘😘😘
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Deleteशुक्रिया
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